योग चक्र विशेष

शरीर चक्र विशेष


       

सात चक्रों का विज्ञान I. मनुष्य केशरीर में कुल मिलाकर 114 चक्र हैं। वैसे तोशरीर में इससे कहीं ज्यादा चक्र हैं, लेकिन ये 114 चक्र मुख्य हैं।
योग में चक्र  या ऊर्जा  के केन्द्र होते हैं। ये नाड़ियों के संगम स्थान भी होते हैं। यूँ तो कई चक्र हैं पर 5-7 चक्रों को मुख्य माना गया है। यौगिक ग्रन्थों में इनहें शरीर के कमल भी कहा गया है। प्रमुख चक्रों के नाम हैं.           
  1. मूलाधार चक्र - मेरुदंड के मूल में, सबसे नीचे। उससे ऊपर आने पर क्रम से
  2. स्वाधिष्ठान चक्र 
  3. मणिपुर चक्र 
  4. अनाहत चक्र 
  5. विशुद्धि चक्र 
  6. आज्ञा चक्र - मेरुदण्ड की समाप्ति पर भ्रूमध्य के पीछे।
  7. सहस्रार चक्र  - कई विद्वान इसे इस लिए चक्र नहीं मानते कि इसमें ईड़ा और पिंगला का प्रभाव नहीं पड़ता।
आयुर्वेद  के अनुसार, चक्र की अवधारणा का संबंध पहिए-से चक्कर  से हैं, माना जाता है
विशिष्ट तौर पर चक्रों का चित्रण किन्हीं दो तरीके से किया जाता है:

  • फूल की तरह

  • चक्र की तरह




1.)  मूलाधार चक्र =   योग साधना की चक्र संकल्पना का पहला चक्र है। यह  के आधार में स्थित है। इसे पशु और मानव चेतना के बीच सीमा निर्धारित करने वाला माना जाता है। इसका संबंध अचेतन मन से है, जिसमें पिछले जीवनों के कर्म और अनुभव संचित रहते हैं
इस चक्र के देवता पशुपति महादेव के रूप में ध्यानावस्थित भगवान शिव हैं। यह निम्नस्तरीय गुणों पर नियंत्रण करने का प्रतीक है। इस चक्र का सांकेतिक प्रतीक चार पंखुड़िय़ों वाला कमल है।
  • इसके सकारात्मक गुण हैं - स्फूर्ति, उत्साह और विकास।
  • इसके नकारात्मक गुण हैं- सुस्ती, निष्क्रियता, आत्म-केंद्रन और विषयासक्ति।
  • इस चक्र का दूसरा प्रतीक चिह्न उल्टा त्रिकोण  है। यह ब्रह्माण्ड  की ऊर्जा  खिंचते चले आने का द्योतक है। यह चेतना के ऊर्ध्व प्रसार का भी बोध कराता है।
  • इस चक्र का अनुरूप तत्त्व पृथवी  है।
  • इस चक्र का रंग लाल है जिसे शिक्त  का रंग माना जाता है।

2.) स्वाधिष्ठान चक्र =  जो मूलाधार चक्र से थोड़ा ऊपर और नाभि से नीचे स्थित है जब अवचेतन से चेतनावस्था की ओर नकारात्मक भावनाएं उत्पन्न होती हैं, उस दौरान हम पूरी तरह से अपना संतुलन खो सकते हैं। जब मनुष्य के अंदर यह चक्र जागृत होजाता है तो उस दौरान मनुष्य की दशा बदल जाती है। इस चक्र का देवता ब्रह्मा सृष्टिकर्ता और उनकी पुत्री सरस्वती बुद्धि और ललितकलाओं की देवी है।मनुष्य के अंदर जिस भी प्रकार की क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास जैसे तमाम तरह के दुर्गुण होते हैं, उन सभी का नाश हो जाता है। इस चक्र में प्रसन्नता, निष्ठा, आत्मविश्वास और ऊर्जा जैसे गुण पैदा होते हैं।

स्वाधिष्ठान चक्र का तत्त्व जल है और इसका रंग नारंगी है । इसका मंत्र ` वाम ‘ है ।
यह चक्र कमल के साथ छह पंखुड़ियाँ से प्रतीकात्मक रूप से दर्शाया जाता है जिसमें हर पंखुड़ी छह नकारात्मक विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करती है । 

टेस्टोस्टेरॉन तथा एस्ट्रोजन हार्मोन के निर्माण को नियमित करके यह व्यक्ति के लैंगिक व्यवहार को प्रभावित करता है ।अवरूध्द तथा असंतुलित स्वाधिष्ठान चक्र की वजह से प्रजनन के मामले, नपुंसकता, मासपेशियों में दर्द, पीठ के नीचले हिस्से में दर्द, एन्डोमेट्रीओसिस, पीसीओएस और उदासी बीमारियाँ हो सकती है इस चक्र का balance बनाना बहुत जरूरी होता है क्यूंकि यक्ति को किसी भी काम को करने के लिए भावना होना जरूरी होता है 

स्वाधिष्ठान चक्र के कारण चित में नवीन भावनाओं उदय होने लगता है और यह चक्र भी अपान वायु के अधीन होता है तथा इसका सम्बंध चन्द्रमा से होता है. 

Note : स्त्रियों में मासिकधर्म आदि चन्द्रमा से संबंधित है तथा इन कार्यो का नियंत्रण स्वाधिष्ठान चक्र द्वारा संभव होता है यह समस्त क्रियाएं स्वाधिष्ठान चक्र के द्वारा ही पूर्ण होती हैं. 

स्वाधिष्ठान चक्र पर ध्यान लगाने से हृदय शांत होता है तथा धारणा व ध्यान की शक्ति प्राप्त होती है और आत्म ज्ञान का अनुभव प्राप्त होता है. 
स्वाधिष्ठान को मूत्र तंत्र और अधिवृक्क से संबंधित भी माना है
स्वाधिष्टान को मजबूत बनाने के लिए तथा इससे संबंधित समस्याओं से मुक्त होने के लिए कुछ रत्नों को धारण किया जा सकता है जैसे - हीरा, मोती, मून स्टोन, जैस्पर इत्यादि.  इस चक्र की अधिष्ठात्री देवी शाकिनी हैं, छह - ब, भ,म, य, र, ल वर्ण दल हैं. इस चक्र के स्वामी देव बह्म है स्वाधिष्ठान चक्र जल के अंतर्गत आता है.


3.) मणिपुर चक्र = सर्वप्रथम  यह योग साधना का  चक्र संकल्पना का तीसरा चक्र है। मणि का अर्थ है गहना और पुर का अर्थ है स्थान। यह नाभि के पीछे स्थित होता है। इसका आधार तत्व अग्नि होने के कारण इसे 'अग्नि' या 'सूर्य केन्द्र' भी कहते हैं।
कुंडलीनी के मणिपुर चक्र में पहुंचने पर वह स्वाधिष्ठान चक्र के निषेधात्मक पक्षों पर विजय पा लेता है। इसके साथ ही उसे स्पष्टता, आत्मविश्वास, आनन्द, आत्म भरोसा, ज्ञान, बुद्धि और सही निर्णय लेने की योग्यता जैसे बहुमूल्य मणियों सरीखे गुण प्राप्त होते हैं। 
यह चक्र अग्न्याशय और पाचक तंत्र की प्रक्रिया को विनियमित करता है। इस केन्द्र में अवरोध पाचन में खराबियां, परिसंचारी रोग, मधुमेह और रक्तचाप में उतार-चढ़ाव जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है।


इस चक्र का प्रतिनिधी रंग पीला है। इसका प्रतिनिधि पशु मेष है। इसका अनुरूप तत्त्व अग्नि है। इसका प्रतीक चिन्ह दस पंखुडिय़ों वाला कमल है। यह मानव शरीर की सभी प्रक्रियाओं का नियंत्रण और पोषण करने वाले दस प्राण शक्तियों का प्रतीक है। इसका दूसरा प्रतीक नीचे की ओर शीर्ष बिन्दु वाला त्रिभुज है। यह ऊर्जा के फैलाव, उद्गम और विकास का द्योतक है। इस चक्र के देवता विष्णु और लक्ष्मी हैं। विष्णु उदीयमान मानव चेतना के प्रतीक हैं। लक्ष्मी भौतिक और आध्यात्मिक समृद्धि की प्रतीक हैं। इसका मंत्र है रम हैं 


4.) अनाहत चक्र = योग साधना की चक्र संकल्पना का चौथा चक्र है। अनाहत का अर्थ है शाश्वत ध्वनि ॐ जाप 


यह चक्र कमल के साथ 12 पंखुडियाँ  के साथ प्रतीकात्मक दर्शाया जाता है । इसका मंत्र ` यम ‘ है तथा रंग हरा है ।  छाती के मध्य में यह चक्र स्थित होता है । 
यह चक्र मुख्य रूप से दिल तथा फेफड़ों के कार्य को नियंत्रित करता है । यह त्वचा, भूजाएँ, रक्ताभिसरण प्रणाली, प्रतिरक्षा प्रणाली नियंत्रित करता है । 
दिल का जोरसे धडकना, रूक जाना तथा उच्च  एलर्जीज्, बुखार, अस्थमा, क्षय और छाती में रक्त संचय होना यह कुछ और अनाहत चक्र के काम न करने से होनेवाली बीमारियाँ है ।.         यह व्यक्ति की प्रतिभा को कलाकार या रचनाकार के रूप में विकसित कर सकती है। इस चक्र से संकल्प शक्ति का उदय होता है  जो व्यक्तिगत व्यवहार मे सहायता करता है.  

जब अनाहत चक्र की ऊर्जा आध्यात्मिक की ओर प्रवाहित होती है, तब हमारी भावनाएं भक्ति, शुद्ध, ईश्वर प्रेम और निष्ठा की ओर उन्मुख होती है। यदि यह सांसारिक कामनाओं की ओ्र उन्मुख होती है तो इच्छा, द्वेष-जलन, उदासीनता और हताशा भाव में वृद्धि होती है। अनाहत चक्र का प्रतीक पशु हिरण है जो अत्यधिक ध्यान देने और चौकन्नेपन का बोधक है। इस चक्र के देवता शिव और पार्वती हैं। शिव चेतना और पार्वती प्रकृति की प्रतीक हैं। 




5.) विशुद्धि चक्रविशुद्ध चक्र  कण्ठ  के पीछे होता है। यह चक्र उच्चतम आध्यात्मिक अनुभूति देता है और इसमें सारी शक्तियों का वास होता है। शरीर के सात चक्तों में पांचवां चक्र है । इसे गला चक्र भी कहते हैं। विशुद्धि चक्र उदान प्राण का प्रारंभिक बिन्दु है। श्वसन के समय शरीर के विषैले पदार्थों को शुद्ध करना इस प्राण की प्रक्रिया है। इस मुख्य कार्य के कारण ही इस चक्र का नाम व्युत्पन्न है। शुद्धिकरण न केवल शारीरिक स्तर पर ही होता है अपितु मनोभाव और मन के स्तर पर भी होता है। जीवन में हमने जिन समस्याओं और दुखद अनुभवों को 'निगल लिया' और भीतर दबा लिया, वे तब तक हमारे अवचेतन मन में बने रहते हैं, जब तक कि हम उनका सामना नहीं करते और बुद्धि से उनका समाधान नहीं कर देते। 

                        (विशुद्धि)
 (विष) = जहर, अशुद्धता
(शुद्धि) = अवशिष्ट निकालना
  इसका मंत्र हम है। विशुद्धि का रंग बैंगनी है

विशुद्धि चक्र का देवता ब्रह्मा है, जो चेतना का प्रतीक है। ध्यान में जब व्यक्ति की चेतना आकाश में समाहित हो जाती है, तो  ज्ञान और बुद्धि प्राप्त होती है। विशुद्धि चक्र का प्रतीक पशु एक सफेद हाथी है। विशुद्धि चक्र शुद्धिकरण का केंद्र होता है योगियों ने इसे अमृत व विष का केंद्र भी बताया है उनके अनुसार जो अमृत बिंदु केंद्र से गिरता है वह यहां अलग होता है विशुद्धि अमृत में और विषय के अलग  पृथक द्वारा  इसमें से विषय तो शरीर के बाहर निकल जाता है और अमृत शरीर को पोषित करता हैइस चक्र की साधना से साधक को आध्यात्मिक क्षेत्र की तरफ बोध होता है एवं साधक को ज्ञान प्राप्त होता है



6.)आज्ञा चक्र - मेरुदण्ड की समाप्ति पर भ्रूमध्य के पीछे होता है योग  के अनुसार आज्ञा चक्र छठा  चक्र है। ध्यान करने से आज्ञा चक्र होने का अभास होता है आग्या का अर्थ है आदेश। आज्ञा चक्र भौंहों के बीच माथे के केंद्र में स्थित होताहै। भारतीय परंपरा
के अनुसार इस स्थान पर  सिंदूर का टीका भी लगाया जाता है  योग क्रिया में त्राटक ध्यान अवस्था को करने से आज्ञा चक्र प्रभावित होता है इस चक्र पर ईडा नाडी पिंगला नाडी व सुषुम्ना नाडी का मिलना होता है  एवं इस स्थान को  त्रिवेणी संगम की तरह दर्शाया है इस प्रकार ईडा  को यमुना पिंगला को गंगा व सुषुम्ना को सरस्वती के रूप में दर्शाया है

            आज्ञा चक्र का रंग सफेद है।
यह आध्यात्मिक शक्ति का अनुसरण केन्द्र हैं 



7.) सहस्रार चक्र  - कई विद्वान इसे इस लिए चक्र नहीं मानते कि इसमें ईड़ा और पिंगला का प्रभाव नहीं पड़ता। सहस्रार चक्र में शक्ति है। मेधा शक्ति एक हार्मोन है, जो मस्तिष्क की प्रक्रियाओं जैसे स्मरण शक्ति, एकाग्रता और बुद्धि को प्रभावित करता है। योग अभ्यासों से मेधा शक्ति को सक्रिय और मजबूत किया जा सकता है।
सहस्रार चक्र में हजारों पंखुडिय़ों वाले कमल का खिलना संपूर्णता का प्रतीक है। इस चक्र के देवता विशुद्ध, सर्वोच्च चेतना के रूप में भगवान शिव है। इसका समान रूप तत्त्व आदितत्त्व, सर्वोच्च, आध्यात्मिक तत्त्व है। मंत्र वही है जैसा आज्ञा चक्र के लिए है मूल  ॐ जप यह चक्र योग के उद्देश्य का प्रतिनिधित्व करता है- आत्म अनुभूति और ईश्वर की अनुभूति, जहां व्यक्ति की आत्मा ब्रह्मांड की चेतना से जुड़ जाती है। जिसे यह उपलब्धि मिल जाती है, वह सभी कर्मों से मुक्त हो जाता है और मोक्ष प्राप्त करता है - पुनर्जन्म और मृत्यु के चक्र से पूरी तरह स्वतंत्र। ध्यान में योगी निर्विकल्प समाधि चक्र पर पहुंचता है, यहां मन पूरी तरह निश्चल हो जाता है और ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय एक में ही समाविष्ट होकर पूर्णता को प्राप्त होते हैं।
   



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